राजेश गुलाटी ने अनुपमा गुलाटी के 72 #टुकड़े किए और D फ्रीजर में रक्खा आफताब ने श्रद्धा के 35 टुकड़े

Manjula (32). She was serving as a home guard attached to the Mahadevapura police station. The accused husband has been identified as Pradeep. The incident occurred on Sunday evening at her parental residence in B Narayanapura.

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  BENGALURU: A shocking domestic tragedy unfolded in Mahadevapura when a home guard was stabbed to death by her husband in front of their two children and family members after he reportedly lured her into a reconciliation meeting and attacked her with a knife. Get breaking news anytime, anywhere. Download the TOI app now! Invest in Asia's fastest growing business corridor Hiranandani Ebony · Sponsored The deceased has been identified as Manjula (32). She was serving as a home guard attached to the Mahadevapura police station. The accused husband has been identified as Pradeep. The incident occurred on Sunday evening at her parental residence in B Narayanapura. Based on the preliminary investigation, police said Pradeep had become addicted to online betting and had been facing financial and family problems. Before the murder, he reportedly recorded selfie videos claiming that the betting habit had ruined his family and stating that both he and his wife would die. A senior officer sa...

ब्राह्मण विदेशी हैं" यह दावा मुख्यतः 19वीं-20वीं सदी के "आर्य प्रवासन सिद्धांत" (Aryan Migration Theory) से जुड़ा है

 कहाँ लिखा हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी है ?

जानना चाहते हो तो पढिए निम्नलिखित पुस्तकें:-

संक्षिप्त उत्तर:

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। हड़प्पा सभ्यता (लगभग 3300-1300 ईसा पूर्व) के पुरातात्विक अवशेषों में वैदिक या ब्राह्मण संस्कृति (जैसी हम ऋग्वेद से जानते हैं) के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। यह ऐतिहासिक शोध का एक प्रमुख निष्कर्ष है।

विस्तृत व्याख्या और प्रमाण:

1. दफनाने बनाम जलाने की प्रथा:

  • हड़प्पा सभ्यता: हड़प्पाई लोग मुख्य रूप से शवों को दफनाते थे। कब्रिस्तान मिले हैं जहाँ शवों को विभिन्न वस्तुओं (जैसे बर्तन, गहने) के साथ दफनाया जाता था। शवों को जलाने (दाह-संस्कार) के साक्ष्य बहुत कम या नहीं के बराबर हैं।

  • वैदिक संस्कृति: ऋग्वेद (जो हड़प्पा सभ्यता के काफी बाद की रचना है) में मृतकों के दाह-संस्कार (अग्नि में जलाने) का स्पष्ट उल्लेख है। ऋग्वेद (10.16) में अंत्येष्टि से संबंधित मंत्र हैं। यह प्रथा वैदिक आर्यों की एक प्रमुख पहचान थी।

  • निष्कर्ष: यह प्रथाओं का बुनियादी अंतर दर्शाता है कि हड़प्पा के निवासी और वैदिक आर्य अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराओं के थे।

2. धार्मिक प्रतीकों व देवताओं में अंतर:


। वैदिक देवता जैसे इंद्र, वरुण, अग्नि या यज्ञ की प्रथा के साक्ष्य नहीं मिलते।

वैदिक संस्कृति: वैदिक साहित्य का केंद्र यज्ञ (हवन), और प्रकृति देवता जैसे इंद्र, अग्नि, सोम, वरुण आदि हैं। ये देवता और कर्मकांड हड़प्पा की कला में अनुपस्थित हैं।

  1. शहरी बनाम ग्रामीण/पशुचारी जीवन: हड़प्पा सभ्यता: यह एक उन्नत शहरी, योजनाबद्ध और व्यापार-प्रधान सभ्यता थी। उनकी लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी है।

वैदिक प्रारंभिक संस्कृति: ऋग्वेद से ज्ञात आर्यों का जीवन अर्द्ध-खानाबदोश, पशुचारी (गाय, घोड़ा) और ग्रामीण था। वे किलेबंद शहरों (पुर) के निवासियों से संघर्ष करते थे, जिन्हें शायद हड़प्पा के अवशेषों से जोड़कर देखा जा सकता है।

मुख्य ऐतिहासिक सिद्धांत और संदर्भ: इन अंतरों के आधार पर, अधिकांश इतिहासकार इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हड़प्पा सभ्यता और वैदिक संस्कृति दो अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराएँ थीं। यहाँ दो प्रमुख दृष्टिकोण हैं:

आर्य प्रवासन/आक्रमण सिद्धांत (अब संशोधित): इसके अनुसार, हड़प्पा सभ्यता के पतन (लगभग 1900-1300 ईसा पूर्व) के बाद, वैदिक आर्य लोग मध्य एशिया से भारतीय उपमहाद्वीप में आए। उनकी संस्कृति (घोड़ा, रथ, दाह-संस्कार, वैदिक देवता) हड़प्पा से भिन्न थी। कालांतर में दोनों संस्कृतियों का मिश्रण हुआ।

आउट ऑफ इंडिया थ्योरी (वैकल्पिक दृष्टिकोण): यह मानता है कि आर्य/वैदिक लोग यहीं के मूल निवासी थे और हड़प्पा सभ्यता ही वैदिक सभ्यता थी। लेकिन यह दृष्टिकोण पुरातात्विक साक्ष्यों (जैसे दफन बनाम दाह, देवताओं का अभाव, लिपि न पढ़ा जाना) के सामने प्रमुख चुनौतियों का सामना करता है और अधिकांश शोधकर्ताओं द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता।

आधुनिक आम सहमति: हड़प्पा सभ्यता और वैदिक संस्कृति अलग थीं, लेकिन हड़प्पा के पतन के बाद उसकी कई सांस्कृतिक विरासत (जैसे पीपल की पूजा, कुछ स्वास्थ्य प्रथाएँ, शायद शिव की अवधारणा का बीज) बाद की भारतीय सभ्यता, जिसमें वैदिक संस्कृति भी शामिल हुई, में विलीन हो गई। इसलिए बाद के हिंदू धर्म में दोनों परंपराओं के तत्व मिलते हैं।

आपके द्वारा दिए गए संदर्भों के संबंध में: "आर्कटिक होम इन द वेदाज" (लोकमान्य तिलक): यह एक प्राचीन आर्यों के मूल स्थान का सिद्धांत है, यह यह नहीं कहता कि हड़प्पा वैदिक थी। बल्कि यह आर्यों के प्रवास का समर्थन करता है।

"डिस्कवरी ऑफ इंडिया" (नेहरू), राहुल सांकृत्यायन, डी.डी. कोसंबी: ये लेखक प्रायः इस बात को स्वीकार करते हैं कि हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियाँ अलग थीं और आर्यों का एक प्रवास हुआ था।

मनुस्मृति: यह बहुत बाद का ग्रंथ है (लगभग 200 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी)। यह हड़प्पा काल की घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी दस्तावेज नहीं है।

निष्कर्ष: आपका अवलोकन सही है। हड़प्पा सभ्यता में वैदिक/ब्राह्मण संस्कृति के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते। शवों को दफनाने की प्रथा इसका एक ठोस उदाहरण है। इससे यह समझ बनती है कि वैदिक संस्कृति एक अलग सांस्कृतिक धारा थी, जो हड़प्पा सभ्यता के बाद के काल में प्रमुख हुई और अंततः इस उपमहाद्वीप की विविध परंपराओं के साथ मिलकर आधुनिक हिंदू धर्म का विकास हुआ।

  1. मनुस्मृति श्लोक नं.२४
  2. बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित वैदिक आर्या का मूलस्थान (Arctic home in the Vedas) ३) मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा दि.२७ दिसंबर १९२४ का काँग्रेस अधिवेशन मे दिया हुआ अध्यक्षीय भाषण। ४) पंडित जवाहर लाल नेहरु का पिता की ओर से पुत्री के नाम खत. ५) लाला लजतपराय द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ २१-२२ ६) बाल गंगाधर तिलक द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास पृष्ठ ६३ ओर ८७ ७) पंडित श्यामबिहारी मिश्रा और सुखदेव बिहारी मिश्रा द्वारा लिखित भारत वर्ष का इतिहास,भाग १ पृष्ठ ६२ ओर ६३ ८) पं.जनार्दन भट्ट एम.ए द्वारा लिखित माधुरी मासिक - भारतीय पुरातत्व की नयी खोज १९२५ - पृष्ठ २७ और २९ ९) पंडित गंगाप्रसाद द्वारा लिखित जाति भेदी पृष्ठ १० और २७ १०) रविँद्र दर्शन - सुख सनपात्री भंडारी पृष्ठ २१ और २२ ११) भारतीय लिपीतत्व - नागेँद्रनाथ बसू. पृष्ठ ४७ और ५१ १२) प्राचीन भारत वर्ष की सभ्यता का इतिहास - रमेश चंद्र दत्त, भाग -१ पृष्ठ १७ और २९ १३) हिँदी भाषा की उत्पति - आचार्य महावीर द्विवेदी १४) हिंदी भाषेचा विकास - बाबू श्यामसुंदर पृ. ३ और ७ १५) हिँदुत्व - पं.लक्ष्मीनारायण गर्दे, पृष्ठ - ८,९ और २९ १६) आर्योँ का आदिम निवास -पं.जगन्नाथ पांचोली. १७) महाभारत मीमांसा - राय बहादूर चिंतामणी विनायक वैद्य. १८) जाति शिक्षा - स्वामी सत्यदेव परिभ्राजक,पृष्ठ ८ और ९ १९) २९ वा अखिल भारतीय हिंदू महासमेलन रामानंद चटर्जी, मॉडर्न रिव्ह्यू का भाषण २०) २९ नवंबर १९२६ के दिन आचार्य प्रफुल्ल चंद्र राय का आज या नियतकालिन लेख। २१) देशभक्त सामाजिक का संपादकीय लेख. पृष्ठ २९ फरवरी १९२४ २२) प्रेमा का वृंदावन मासिक - योगेशचंद्र पाल १९२७ पृष्ठ १३६ और १४३ २३) काका कालेलकर की पिछडा वर्ग रिपोर्ट २४) धर्मशास्राचा इतिहास - पा.वा.काणे करना २५) हिंदू सभ्यता - राधाकृष्ण मुखर्जी, पृष्ठ ४१,४७ और ५९ २६) डी.डी.कोसंबी - प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता २७) वोल्गा से गंगा - राहुल सांस्कृत्यायन २८) ग्रीक ओरिजन्स ऑफ कोकणस्थ चित्पावन -प्रताप जोशी २९) ना.गो.चाफेकर चित्पावन - पृष्ठ २९५ ३०) वि.का.राजवाडे के मतानुसार ब्राम्हण विदेशी है। ३१) स्वामी दयानंद सरस्वती -सत्यप्रकाश ग्रंथ ३२) टाईम्स ऑफ इंडिया का 2001 का DNA रिपोर्ट ३३) ऋग्वेद मे लिखा है की ब्राह्मण विदेशी है. ३४)आर्यां का मूळ वस्तीस्थान उत्तर ध्रुव -(आर्टीक्ट होम ईन द वेदाज) 35)हम ब्राह्मण लोग मध्य एशिया से भारत आये है। (डिस्कव्हरी ऑफ इंडिया- पंडित जवाहरलाल नेहरु) #india #adivasi #hindu #post

ब्राह्मण विद्वानों ने कहा है कि "ब्राह्मण विदेशी हैं"? उत्तर: हाँ, 19वीं और 20वीं सदी के कई प्रमुख ब्राह्मण समुदाय के विद्वानों और नेताओं ने आधुनिक ऐतिहासिक व नृतात्विक शोध के आधार पर यह माना था कि आर्य (जिनसे वैदिक संस्कृति व ब्राह्मणवाद का विकास हुआ) भारत के मूल निवासी नहीं थे, बल्कि बाहर से आए थे।

यह "आर्य प्रवासन सिद्धांत" को मानने का परिणाम था, न कि स्वयं को "विदेशी" घोषित करना।

कुछ प्रमुख उदाहरण और संदर्भ: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक (ब्राह्मण):

उन्होंने अपनी पुस्तक "The Arctic Home in the Vedas" (1903) में प्रस्ताव रखा कि आर्यों का मूल निवास उत्तरी ध्रुव के पास का कोई क्षेत्र था, जहाँ से वे विभिन्न दिशाओं में फैले। इससे "आर्य भारत के मूल निवासी नहीं हैं" की धारणा बल मिलती थी।

पंडित जवाहरलाल नेहरू (ब्राह्मण वंश से):

अपनी पुस्तक "The Discovery of India" (1946) में उन्होंने स्पष्ट लिखा:

"यह आम तौर पर स्वीकार किया जाता है कि आर्य भारत में बाहर से आए... वे पश्चिमोत्तर दर्रों से भारत में घुसे और धीरे-धीरे पूर्व और दक्षिण की ओर बढ़े।" (अध्याय: 'आर्यों का आगमन')

वे आर्य प्रवासन सिद्धांत को मानते थे।

राहुल सांकृत्यायन (ब्राह्मण परिवार में जन्मे):

अपनी पुस्तक "वोल्गा से गंगा" (1944) में उन्होंने आर्यों के मध्य एशिया से भारत आगमन की कहानी को एक साहित्यिक रूप दिया। यह पुस्तक इस धारणा पर आधारित है कि भारतीय आर्य बाहर से आए।

डी. डी. कोसंबी (प्रसिद्ध गणितज्ञ व इतिहासकार, ब्राह्मण परिवार से):

अपनी पुस्तक "Ancient India: A History of its Culture and Civilization" में उन्होंने आर्य प्रवासन सिद्धांत का विस्तार से विवेचन किया है।

विनायक दामोदर सावरकर (ब्राह्मण):

उन्होंने "हिंदुत्व" में लिखा कि हिंदू वे हैं जो भारत को पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानते हैं। उनकी परिभाषा में सिंधु घाटी से गंगा के मैदान तक के सभी निवासी शामिल थे, लेकिन उन्होंने भी "आर्य आगमन" की ऐतिहासिक घटना को स्वीकार किया था।

नोट: इन विद्वानों ने "ब्राह्मण विदेशी हैं" जैसा सीधा वाक्य नहीं लिखा, बल्कि वैदिक संस्कृति के वाहक आर्यों के बाहर से आने के ऐतिहासिक सिद्धांत को स्वीकार किया। चूंकि ब्राह्मण वैदिक परंपरा के रक्षक माने जाते हैं, इसलिए तर्क यह बनता था कि उनके पूर्वज भी उसी प्रवास का हिस्सा थे।

भाग 2: क्या ब्राह्मण स्वयं को "हिंदू" नहीं कहते थे? उत्तर: यह आंशिक रूप से सही है, लेकिन संदर्भ महत्वपूर्ण है।

"हिंदू" शब्द की उत्पत्ति:

"हिंदू" शब्द फारसी मूल का है। सिंधु नदी के पार के लोगों को फारसी भाषी लोग "हिंदू" कहने लगे। यह एक भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान थी, धार्मिक पहचान नहीं।

मुगलकाल में: मुगल दस्तावेजों (जैसे अकबर के 'आइन-ए-अकबरी') में "हिंदू" शब्द का प्रयोग भारत के सभी गैर-मुस्लिम निवासियों के लिए होता था। इसमें ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य, शूद्र सभी शामिल थे। ब्राह्मण भी इस व्यापक श्रेणी में आते थे, लेकिन वे अपनी पहचान वर्ण (ब्राह्मण) या दार्शनिक सम्प्रदाय (जैसे वैष्णव, शैव) के आधार पर करते थे।

ब्राह्मणों की स्व-पहचान:

स्वधर्म के रूप में: ब्राह्मण स्वयं को "वैदिक धर्म" या "सनातन धर्म" का अनुयायी मानते थे, न कि "हिंदू" का। "हिंदू" एक बाहरी लेबल था।

मध्यकालीन ग्रंथ: भक्ति आंदोलन के साहित्य (जैसे तुलसीदास, मीराबाई) में "हिंदू" शब्द का प्रयोग मुस्लिम शासन के विरोध में एक सामूहिक सांस्कृतिक पहचान के रूप में उभरता है। ब्राह्मण इस पहचान का हिस्सा थे।

अंग्रेजों का योगदान:

अंग्रेजों ने जनगणना (1872 onwards) और कानूनी वर्गीकरण के जरिए "हिंदू" को एक एकीकृत धार्मिक पहचान बनाने में अहम भूमिका निभाई।

उन्होंने "हिंदू लॉ" बनाया, जिसमें सभी गैर-मुस्लिम, गैर-ईसाई, गैर-पारसी लोगों को "हिंदू" मान लिया गया। इसने ब्राह्मणों सहित सभी समुदायों को एक धार्मिक छतरी के नीचे ला दिया।

संदर्भ: "The Construction of Religious Boundaries" नामक पुस्तक में श्रीनिवासन लिखते हैं कि 19वीं सदी तक, अंग्रेजी शिक्षा और सुधार आंदोलनों (जैसे आर्य समाज, ब्रह्मो समाज) के कारण ब्राह्मणों सहित सभी ने "हिंदू" को एक व्यापक धार्मिक पहचान के रूप में अपनाना शुरू कर दिया।

सारांश: पहले प्रश्न का सार: 19वीं-20वीं सदी के कई ब्राह्मण बुद्धिजीवियों ने (तिलक, नेहरू, सांकृत्यायन आदि) आर्य प्रवासन सिद्धांत को स्वीकार करते हुए लिखा कि वैदिक संस्कृति के वाहक भारत के मूल निवासी नहीं थे। इससे यह भावना निकलती है कि ब्राह्मणों के पूर्वज भी उसी प्रवासी समुदाय का हिस्सा थे।

दूसरे प्रश्न का सार: "हिंदू" शब्द बाहरी उत्पत्ति का है। मुगलकाल में यह एक भौगोलिक/सांस्कृतिक पहचान थी, जिसमें ब्राह्मण भी आते थे, लेकिन वे स्वयं को वर्ण या सम्प्रदाय से ज्यादा पहचानते थे। अंग्रेजी राज में जनगणना और कानूनी वर्गीकरण ने "हिंदू" को एक सुस्पष्ट धार्मिक पहचान बना दिया, जिसे ब्राह्मणों ने भी अंततः अपना लिया।

अंतिम बात: यह पूरा विवाद आधुनिक काल में राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति से गहरे जुड़ा है। प्राचीन काल में "विदेशी" या "देशी" की अवधारणा आज की तरह स्थिर नहीं थी। हज़ारों साल पहले हुए प्रवासों के आधार पर आज के किसी समुदाय को "विदेशी" कहना ऐतिहासिक दृष्टि से सही नहीं है, क्योंकि वे सदियों से इस भूमि और संस्कृति के अभिन्न अंग रहे हैं।


रवींद्रनाथ टैगोर के प्रसिद्ध उपन्यास "गोरा" (1910) में यह विषय स्पष्ट रूप से उठाया गया है।

"गोरा" उपन्यास का संदर्भ: उपन्यास का मुख्य पात्र "गोरा" (वास्तविक नाम: गौरीशंकर) एक ऐसा युवक है जो खुद को कट्टर हिंदू, ब्राह्मण और राष्ट्रवादी मानता है। लेकिन कथानक के अंत में एक नाटकीय रहस्योद्घाटन होता है।

महत्वपूर्ण घटना:

गोरा को पता चलता है कि उसका जन्म एक आयरिश माता-पिता (ब्रिटिश सैनिक और उसकी पत्नी) के घर हुआ था। 1857 के विद्रोह के दौरान, उसके माता-पिता मारे गए और एक ब्राह्मण महिला (आनंदमयी) ने उसे गोद लेकर पाला-पोसा।

इसका मतलब यह हुआ कि गोरा का जन्म एक गैर-हिंदू, विदेशी परिवार में हुआ था, और वह जाति से ब्राह्मण नहीं है।

टैगोर का संदेश और दार्शनिक बिंदु: इस प्लॉट ट्विस्ट के माध्यम से टैगोर एक गहरा सामाजिक-धार्मिक संदेश देते हैं:

"हिंदू" की पुनर्परिभाषा: टैगोर यह कहते हैं कि "हिंदू" होना केवल जन्म, जाति या कर्मकांड की बात नहीं है। गोरा, जो अपना पूरा जीवन एक कट्टर ब्राह्मण के रूप में जीता रहा, वह वास्तव में जन्म से हिंदू नहीं था। फिर भी, उसका विचार, संस्कार और भारतीयता उसे हिंदू बनाती है।

जाति और धर्म पर प्रहार: उपन्यास जाति की कृत्रिमता और संकीर्णता पर करारा प्रहार करता है। गोरा की असली पहचान का पर्दाफाश इस बात को रेखांकित करता है कि धार्मिक पहचान रक्त या जन्म पर आधारित नहीं, बल्कि विचार और आचरण पर आधारित होनी चाहिए।

उदार मानवतावाद: टैगोर का अंतिम संदेश मानवतावादी है। आनंदमयी (गोरा की गोद ली हुई माँ) कहती हैं कि "सबके लिए सब जगह प्रवेश है" – यानी ईश्वर और धर्म का द्वार सबके लिए खुला है, चाहे उसका जन्म किसी भी जाति या देश में हुआ हो।

आपके कथन का स्पष्टीकरण: आपका कहना सही है कि टैगोर ने "गोरा" के माध्यम से दिखाया कि एक व्यक्ति जो स्वयं को शुद्ध ब्राह्मण समझता है, वह वास्तव में जन्म से हिंदू (या ब्राह्मण) भी नहीं था। यह टैगोर की जाति-प्रथा और धार्मिक कट्टरता की आलोचना है।

लेकिन एक महत्वपूर्ण बात समझनी जरूरी है: टैगोर यह नहीं कह रहे हैं कि "सभी ब्राह्मण विदेशी हैं।" बल्कि, वे एक काल्पनिक कहानी के जरिए यह दर्शाना चाह रहे हैं कि जाति और धर्म की बाहरी, जन्मगत पहचान महत्वहीन है। असली पहचान मानवीय मूल्यों और आंतरिक विश्वास में निहित है।

संदर्भ के लिए उपन्यास का अंश (सार): उपन्यास का अंतिम भाग (अध्याय 79-80 के आसपास) जहाँ गोरा को अपनी वास्तविक पहचान का पता चलता है, यह विचार स्पष्ट होता है। गोरा आनंदमयी से कहता है कि अब उसका "हिंदू होना" और "ब्राह्मण होना" समाप्त हो गया। इस पर आनंदमयी उत्तर देती हैं कि अब तुम सच्चे अर्थों में मेरे बेटे बन गए हो, क्योंकि तुम्हारी सभी बनावटी पहचान हट गई है।

निष्कर्ष: रवींद्रनाथ टैगोर ने "गोरा" उपन्यास में जाति और धर्म की रूढ़िवादी परिभाषाओं को तोड़ा है। उन्होंने दिखाया है कि एक व्यक्ति जन्म से ब्राह्मण/हिंदू न होते हुए भी, अपने विचार और संस्कार से सच्चा हिंदू (या मानव) हो सकता है। यह टैगोर की उदार, समावेशी और मानवतावादी दृष्टि का प्रमाण है, न कि यह कि सभी ब्राह्मण ऐतिहासिक रूप से विदेशी हैं।

अतः, "गोरा" पढ़ना इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। यह उपन्यास जाति, धर्म और राष्ट्रीय पहचान के सवालों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।

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