राजेश गुलाटी ने अनुपमा गुलाटी के 72 #टुकड़े किए और D फ्रीजर में रक्खा आफताब ने श्रद्धा के 35 टुकड़े

अजीम कायद जो कौम को कयामत दिखा दे सुलतान सलाहुद्दीन अवेसी का बेटा असद अवेसी

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 वाह सलाहियत है असद अवेसी में  जो फ़िलिस्तीन के मुशा काज़िम थे 1917 जो मिशर के सुल्तान हुसैन कामेल में थी 1914 जो मक्का के शरीफ़ हुसैन बिन अली समय: 1916 अब्दुल रहमान अल-गिलानी समय: 1920 में थी याह सारी ख़ुबियाँ अकेले असद अवेसी  में हैं क्या हुआ क्या मिला था उनहेन जिन्होन उस्मानी सल्तनत के खिलाफ बगावत करने के लिए लोगों को उल्कसया और वह चंद  दीनो के सुल्तान बने ठीक उसी तरह चंद लोकसभा विधान सभा और भी जीत जाते हैं लेकिन कौम का मुस्तकबिल उससे ज्यादा अँधेरे में जाने वाला है मूसा काज़िम अल-हुसैनी: मुख्य तथ्य और उनकी भूमिका विवरण तथ्य पहचान एक प्रसिद्ध अल-हुसैनी परिवार से ताल्लुक रखने वाले राजनेता और फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद के अग्रणी नेता। मेयर कब बने? 1918 में ब्रिटिश सैन्य गवर्नर रोनाल्ड स्टोर्स द्वारा नियुक्त किए गए और 1920 तक इस पद पर रहे। पद से हटाए जाने का कारण अप्रैल 1920 के अरब-यहूदी दंगों (नबी मूसा दंगे) को भड़काने और ब्रिटिश शासन के खिलाफ बोलने के आरोप में ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें मेयर के पद से हटा दिया। ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष बर्खास्तगी के ब...

मुंबई दंगों के दौरान, मात्र 15 साल की उम्र में शाहिद को गिरफ्तार किया गया। उन्हें टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (TADA

 शाहिद आज़मी का परिचयशाहिद आज़मी (1977-2010)


एक भारतीय वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता थे, जो मुंबई में रहते थे। वे मुख्य रूप से उन लोगों का बचाव करते थे जो आतंकवाद के झूठे आरोपों में फंसाए गए थे, जैसे 26/11 मुंबई हमलों के सह-आरोपी फहिम अंसारी। � उनकी जिंदगी संघर्षपूर्ण रही, जिसमें बचपन की घटनाओं ने उन्हें न्याय के लिए लड़ने वाला बनाया। �जेल का मामला1992 के मुंबई दंगों के दौरान, मात्र 15 साल की उम्र में शाहिद को गिरफ्तार किया गया। उन्हें टेररिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट (TADA) के तहत राजनेताओं और शिवसेना नेता बाल ठाकरे की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। � दिल्ली के तिहाड़ जेल में सात साल बिताने के बाद, 2001 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया, क्योंकि सबूतों की कमी थी। � इस दौरान उन्होंने जेल में ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। �शिक्षाजेल में रहते हुए शाहिद ने 12वीं कक्षा पूरी की और बैचलर ऑफ आर्ट्स (BA) की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने क्रिएटिव राइटिंग में पोस्टग्रेजुएट कोर्स किया। � रिहाई के बाद मुंबई के के.सी. कॉलेज से उन्होंने कानून (LLB) की डिग्री हासिल की और 2003 में वकील बने। � उनकी शिक्षा ने उन्हें निर्दोषों के लिए लड़ने का हौसला दिया। �हत्या और हत्यारे11 फरवरी 2010 को मुंबई के कुरला स्थित उनके कार्यालय में चार हथियारबंद हमलावरों ने उन पर गोलीबारी की, जिससे उनकी मौत हो गई। � पुलिस ने हत्या का मामला सुलझा लिया, जिसमें भारत नेपाली गैंग के सदस्य मुख्य आरोपी थे। हत्यारे देवेंद्र बाबू जगताप उर्फ जेडी (मुख्य शूटर), पिंटू देवराम दगाले, विनोद यशवंत विचारे और हसमुख शंकर सोलंकी थे, जिन्हें महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) के तहत गिरफ्तार किया गया। � हत्या का मकसद स्पष्ट नहीं है, लेकिन उनके आतंकवाद मामलों से जुड़े काम को वजह माना जाता है। 






शाहिद आज़मी के प्रमुख मुकदमेशाहिद आज़मी ने मुख्य रूप से उन मुकदमों को लड़ा जो आतंकवाद से जुड़े थे, जहां वे निर्दोष मुसलमानों का बचाव करते थे। उन्होंने POTA और MCOCA जैसे सख्त कानूनों को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट में कई मामलों को रोका। � उनके प्रमुख मुकदमों में 2002 का घाटकोपर बस बम विस्फोट, 7/11 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट, 2006 औरंगाबाद हथियार तस्करी, 2006 मालेगांव ब्लास्ट, 26/11 मुंबई हमले और 2001 अमेरिकन सेंटर अटैक शामिल हैं। �� इनमें से कई मामलों में उन्होंने 17 निर्दोषों को बरी करवाया। �बचाव किए गए प्रमुख आरोपीफहिम अंसारी (फहमी अरशद अंसारी): 26/11 मुंबई हमलों के सह-आरोपी, जिन्हें शाहिद ने निर्दोष साबित करने की कोशिश की। �सबाहुद्दीन (सलाहुद्दीन): 26/11 मामले में फहिम के साथ आरोपी। �अरिफ पानवाला: 2002 घाटकोपर बस बम विस्फोट के मुख्य आरोपी, जिन्हें POTA के तहत बरी करवाया। �अमेरिकन सेंटर अटैक (2001, कोलकाता): पांच आरोपी, जिनमें से दो की मौत की सजा रद्द हुई और एक बरी। �इंडियन मुजाहिदीन मामले: लगभग 64 आरोपी, जैसे अहमदाबाद, जयपुर, दिल्ली ब्लास्टों में फंसे युवा। �मुलुंड, घाटकोपर, मुंबई सेंट्रल, विले पार्ले ब्लास्ट: छह आरोपी। �शाफी कमर अफगानी: पाकिस्तानी एजेंट के आरोप में। �अब्दुर रहमान: गुलबर्गा आतंकवाद मामले में। �फहमीदा सईद: 2003 गेटवे ऑफ इंडिया और जावेरी बाजार ब्लास्ट (इस मामले में हार गए)। �शाहिद ने कुल 120 से अधिक आतंकवाद से जुड़े मामलों को संभाला, ज्यादातर मुफ्त में। � उनके काम ने निर्दोषों को न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। �




 

शाहिद आज़मी के सबसे विवादित केसशाहिद आज़मी के सबसे विवादित केस वे थे जो बड़े आतंकवादी हमलों से जुड़े, जहां उन्होंने निर्दोष होने का दावा करने वाले आरोपी का बचाव किया और सख्त कानूनों जैसे MCOCA और POTA को चुनौती दी। � इन केसों में पुलिस की जांच, जबरन कबूलनामे और सबूतों की कमी पर सवाल उठाने से विवाद बढ़ा, जिसने उन्हें धमकियां दिलाईं। � उन्होंने सात साल के करियर में 17 बरी करवाए, लेकिन 26/11 और 7/11 जैसे मामलों ने उन्हें सबसे ज्यादा आलोचना का शिकार बनाया। �26/11 मुंबई हमलों का केसशाहिद ने 2008 के मुंबई हमलों में सह-आरोपी फहिम अंसारी और सबाहुद्दीन का बचाव किया, जिन पर हमलावरों के लिए नक्शे तैयार करने का आरोप था। � उन्होंने तर्क दिया कि सबूत नकली हैं और आरोपी निर्दोष हैं, जिससे मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में फहिम को बरी कर दिया। � यह केस बेहद विवादित रहा क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा होने पर बचाव को राष्ट्र-विरोधी माना गया, और यही केस लड़ते हुए उनकी हत्या हो गई। �7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोटों का केस2006 के ट्रेन विस्फोटों में 13 आरोपी का प्रतिनिधित्व किया, जहां उन्होंने MCOCA के इस्तेमाल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और फरवरी 2008 में मुकदमे पर रोक लगवाई। � उन्होंने आर्थर रोड जेल में यातनाओं के आरोप लगाते हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जो सही पाई गई। � विवाद तब बढ़ा जब 2015 में कई दोषी ठहराए गए, लेकिन 2025 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 को बरी कर दिया, जो शाहिद के दावों की पुष्टि करता है। �2006 मालेगांव विस्फोटों का केसमहाराष्ट्र में 39 आरोपी का बचाव किया, MCOCA को चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट से मुकदमे पर रोक दिलाई। � केस विवादास्पद रहा क्योंकि इसमें लश्कर-ए-तैयबा और SIMI पर आरोप थे, और शाहिद ने जांच की कमियों को उजागर किया। � उनके प्रयासों से कई आरोपी बाद में बरी हुए, लेकिन यह मुस्लिम समुदाय के खिलाफ पूर्वाग्रह को दर्शाता था। �2001 अमेरिकन सेंटर हमले का केसकोलकाता में पांच आरोपी का प्रतिनिधित्व किया, जिन्हें मौत की सजा सुनाई गई थी। � शाहिद ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिससे दो की मौत की सजा उम्रकैद में बदली गई और एक बरी हो गया। � विवाद इसलिए क्योंकि अमेरिकी दूतावास पर हमला राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा था, और बचाव को संदिग्ध माना गया। �



शाहिद आज़मी द्वारा बचाव किए गए प्रमुख आरोपियों के अदालती नतीजेशाहिद आज़मी ने सात साल के करियर में 17 निर्दोषों को बरी करवाया, जो मुख्य रूप से आतंकवाद के झूठे मामलों में थे। � इनमें से कई मामलों में उनकी अपीलों ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सफलता दिलाई, लेकिन कुछ में राज्य की अपीलें लंबित रहीं। � नीचे प्रमुख मामलों के आरोपी, अदालती फैसलों और अपीलों का वर्तमान हाल दिया गया है (नवंबर 2025 तक)। �26/11 मुंबई हमलों के आरोपीफहिम अंसारी और सबाहुद्दीन अहमद: विशेष अदालत ने मई 2010 में सबूतों की कमी से बरी किया। ��� बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य की अपील स्वीकार की और वारंट जारी किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2012 को फहिम को सभी आरोपों से बरी कर दिया। ��� सबाहुद्दीन भी बरी हुए, लेकिन बाद में अन्य मामले में दोषी ठहराए गए; फरवरी 2025 में फहिम ने हाई कोर्ट से ऑटो चलाने का प्रमाणपत्र मांगा, जो उनकी रिहाई दर्शाता है। � राज्य की अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित रही, लेकिन कोई उलटा फैसला नहीं आया। �7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोटों के आरोपीशाहिद ने कई आरोपियों का बचाव किया, जिनमें कमल अंसारी (A1), मोहम्मद फैसल शेख (A3), एहतेशाम सिद्दीकी (A4) आदि शामिल थे। � विशेष अदालत ने 2015 में पांच को मौत की सजा और सात को उम्रकैद दी। � बॉम्बे हाई कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को सभी 12 को सबूतों की कमी से बरी कर दिया, यातनाओं से लिए गए कबूलनामों को अमान्य ठहराते हुए। ��� महाराष्ट्र सरकार ने 22 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, और पीड़ित परिवार भी अपील की योजना बना रहे हैं; मामला लंबित है। ��2006 मालेगांव विस्फोटों के आरोपीशाहिद ने 39 मुस्लिम आरोपियों का बचाव किया और 2008 में सुप्रीम कोर्ट से मुकदमे पर रोक लगवाई। �� MCOCA प्रावधान को चुनौती असफल रही, लेकिन रोक ने समय दिया। � अप्रैल 2016 में नौ आरोपी (जिनमें शाहिद के क्लाइंट शामिल) को स्वामी असईमानंद के कबूलनामे के आधार पर छुट्टी (डिस्चार्ज) मिली। � शेष मामलों में कई बरी हुए, लेकिन कुछ अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं; समग्र रूप से शाहिद के प्रयास सफल रहे। �अन्य प्रमुख मामले2002 घाटकोपर बस विस्फोट: अरिफ पानवाला और आठ अन्य को POTA के तहत सबूतों की कमी से बरी किया, जिसने कानून को रद्द करने में भूमिका निभाई। � कोई अपील नहीं; फैसला अंतिम।2001 अमेरिकन सेंटर हमला (कोलकाता): पांच आरोपियों में दो की मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया, और एक को बरी किया। � अपीलें सफल; शेष तीन उम्रकैद में हैं, लेकिन कोई हालिया बदलाव नहीं। �ये नतीजे शाहिद के काम की सत्यता दर्शाते हैं, जहां अपीलों ने निर्दोषों को न्याय दिलाया। ��



शाहिद आज़मी द्वारा बचाव किए गए प्रमुख आरोपियों के अदालती नतीजेशाहिद आज़मी ने सात साल के करियर में 17 निर्दोषों को बरी करवाया, जो मुख्य रूप से आतंकवाद के झूठे मामलों में थे। � इनमें से कई मामलों में उनकी अपीलों ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में सफलता दिलाई, लेकिन कुछ में राज्य की अपीलें लंबित रहीं। � नीचे प्रमुख मामलों के आरोपी, अदालती फैसलों और अपीलों का वर्तमान हाल दिया गया है (नवंबर 2025 तक)। �26/11 मुंबई हमलों के आरोपीफहिम अंसारी और सबाहुद्दीन अहमद: विशेष अदालत ने मई 2010 में सबूतों की कमी से बरी किया। ��� बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य की अपील स्वीकार की और वारंट जारी किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2012 को फहिम को सभी आरोपों से बरी कर दिया। ��� सबाहुद्दीन भी बरी हुए, लेकिन बाद में अन्य मामले में दोषी ठहराए गए; फरवरी 2025 में फहिम ने हाई कोर्ट से ऑटो चलाने का प्रमाणपत्र मांगा, जो उनकी रिहाई दर्शाता है। � राज्य की अपील सुप्रीम कोर्ट में लंबित रही, लेकिन कोई उलटा फैसला नहीं आया। �7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोटों के आरोपीशाहिद ने कई आरोपियों का बचाव किया, जिनमें कमल अंसारी (A1), मोहम्मद फैसल शेख (A3), एहतेशाम सिद्दीकी (A4) आदि शामिल थे। � विशेष अदालत ने 2015 में पांच को मौत की सजा और सात को उम्रकैद दी। � बॉम्बे हाई कोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को सभी 12 को सबूतों की कमी से बरी कर दिया, यातनाओं से लिए गए कबूलनामों को अमान्य ठहराते हुए। ��� महाराष्ट्र सरकार ने 22 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की, और पीड़ित परिवार भी अपील की योजना बना रहे हैं; मामला लंबित है। ��2006 मालेगांव विस्फोटों के आरोपीशाहिद ने 39 मुस्लिम आरोपियों का बचाव किया और 2008 में सुप्रीम कोर्ट से मुकदमे पर रोक लगवाई। �� MCOCA प्रावधान को चुनौती असफल रही, लेकिन रोक ने समय दिया। � अप्रैल 2016 में नौ आरोपी (जिनमें शाहिद के क्लाइंट शामिल) को स्वामी असईमानंद के कबूलनामे के आधार पर छुट्टी (डिस्चार्ज) मिली। � शेष मामलों में कई बरी हुए, लेकिन कुछ अपीलें सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं; समग्र रूप से शाहिद के प्रयास सफल रहे। �अन्य प्रमुख मामले2002 घाटकोपर बस विस्फोट: अरिफ पानवाला और आठ अन्य को POTA के तहत सबूतों की कमी से बरी किया, जिसने कानून को रद्द करने में भूमिका निभाई। � कोई अपील नहीं; फैसला अंतिम।2001 अमेरिकन सेंटर हमला (कोलकाता): पांच आरोपियों में दो की मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद में बदल दिया, और एक को बरी किया। � अपीलें सफल; शेष तीन उम्रकैद में हैं, लेकिन कोई हालिया बदलाव नहीं। �ये नतीजे शाहिद के काम की सत्यता दर्शाते हैं, जहां अपीलों ने निर्दोषों को न्याय दिलाया। ��

फहिम अंसारी के 26/11 मामले का पूरा विवरणफहिम अरशद मोहम्मद यूसुफ अंसारी (Faheem Ansari) को 2008 के मुंबई हमलों (26/11) में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के साथ साजिश रचने, नक्शे तैयार करने और हमलावरों को मदद पहुंचाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। � विशेष अदालत ने मई 2010 में सबूतों की कमी के कारण उन्हें और सबाहुद्दीन अहमद को सभी आरोपों से बरी कर दिया, जबकि अजमल कसाब को दोषी ठहराया। � अंसारी ने शाहिद आज़मी का बचाव किया, जिन्होंने जांच की कमियों को उजागर किया। �प्रारंभिक अदालती फैसलामुंबई की विशेष TADA अदालत ने 6 मई 2010 को फैसला सुनाया कि फहिम और सबाहुद्दीन के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं है, जैसे नक्शे नकली पाए गए और कबूलनामा जबरन लिया गया। �� अदालत ने नोट किया कि बेहतर नक्शे ऑनलाइन उपलब्ध थे, इसलिए कोई साजिश सिद्ध नहीं हुई। � फहिम को 2010 में रिहा किया गया, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने राज्य की अपील पर अस्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किए। �अपीलों का इतिहासमहाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की, लेकिन हाई कोर्ट ने बरी होने को बरकरार रखा। � सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2012 को राज्य की अपील खारिज कर दी और बरी होने को अंतिम रूप दिया, कहते हुए कि सबूत अपर्याप्त हैं। �� अपील प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, और 26/11 मामले में कोई पेंडिंग अपील नहीं बची। � हालांकि, फहिम को अलग UP के 2008 रामपुर CRPF हमले में 10 साल की सजा हुई, जो 2019 में पूरी कर रिहा हुए। ��वर्तमान स्थिति (नवंबर 2025)26/11 मामले में फहिम की बरी होने की स्थिति अपरिवर्तित है, लेकिन फरवरी 2025 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (PCC) के लिए याचिका दायर की, ताकि ऑटो रिक्शा चलाकर जीविका चला सकें। �� सरकार ने PCC अस्वीकार कर दिया, दावा किया कि वे LeT सदस्य के संदेह में निगरानी में हैं, लेकिन जॉब्स के लिए PCC न चाहिए तो ले सकते हैं। ��� हाई कोर्ट ने चैंबर में सुनवाई की (25 नवंबर 2025), गोपनीय रिपोर्ट देखी और मामला लंबित है; अंतिम फैसला बाकी। �� यह याचिका बुनियादी अधिकारों (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन दर्शाती है। �

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